हिन्दू सनातन शिव धर्म

सनातन शिव हिंदू धर्म के संस्थापक सब से बडे भगवान देवों के देव महादेव हैं.

सनातन धर्म अपने मूल रूप हिंदु धर्म के वैकल्पिक नाम से जाना जाता है।

वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिये ‘सनातन धर्म’ नाम मिलता है।

‘सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘हमेशा बना रहने वाला’, अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त, वह सिर्फ मूल तत्व सदा शिव परमशिव ही हैं जिन्हें पाराब्रम्हा भी कहा जाता है ।

धर्म शब्द का अर्थ

धारयति इति धर्मः – धर्म का अर्थ होता है “धारण करना”।
प्रश्न – क्या धारण करना चाहिए?

उत्तर – जो धारण करने योग्य हो.

अब प्रश्न उठता है कि धारण करने योग्य क्या है जिसे धारण करना ही चाहिए जिसे धारण करने से सभी दुखों से छुटकारा मिल सके जो देवों का देव महादेव ही है, जिस का जन्म है न मृत्यु वही तत्व ही सत्य जो सत्य हो उसी को धारण करना चाहिए जो मोक्ष दाता है ।
प्रश्न – कैसे धारण करें ?

उत्तर – जो धर्मग्रंथों ने कहा कि प्रतिदिन शिव पूजन करना जिससे दिन प्रति दिन ऊर्जा का संचार शरीर में होता रहे सत्य की पहचान सत्यम शिवम सुन्दरम, क्षमा, विद्या, दया, दान शिव धर्म, तप आदि।

धर्म क्या है?

जो धारण करने योग्य है उसे धर्म कहते है। इसलिये जो उपर्युक्त महाभारत में कहा कि कर्म में लगे रहना, उदारता, दण्ड, सत्य, दान धर्म है।

इसका अर्थ यह है की ये धारण करने योग्य है। इसलिये इस धर्म को निभाना चाहिए अर्थात् इनको धारण करना चाहियें। दुसरे शब्दों में जो सनातन धर्म के ग्रंथों में धर्म के बारे में कहा गया है कि ये धर्म है, ये अधर्म है और मनुष्य को धर्म का पालन करना चाहिए। इसका भाव यह है कि ये धारण करने योग्य है और मनुष्य को धारण करना चाहिए एवं पालन करना चाहिए। उदाहरण के लिए –

शिव जी का ध्यान हमेशा मन में पक्ष कर ही कर्म में लगे रहना धर्म है। अर्थात् कर्म में लगे रहना धारण करने योग्य है।
उदारता धर्म है। अर्थात् उदारता धारण करने योग्य है।
सत्य धर्म है। अर्थात् सत्य धारण करने योग्य है।
दया धर्म है। अर्थात् दया धारण करने योग्य है।

एक प्रश्न मन में उठ सकता है कि ये धारण करने योग्य क्यों है? क्यों हम सत्य, क्षमा, विद्या, दया आदि को धारण करे? क्यों हम असत्य, क्रोध, अविद्या, क्रूरता आदि को नहीं धारण करे?

ये ग्रंथ कौन होते है हमें सिखाने वाला। तो इसका उत्तर बड़ा सरल है – आप असत्य, क्रोध, अविद्या, क्रूरता को धर्म मान ले यानी धारण करले। ऐसा करते ही, स्वयं का और पुरे समाज का बुरा दिन शुरु हो जायेगा। क्योंकि फिर कोई व्यक्ति किसी की मदद नहीं करेगा, हमेंशा झूट बोलेगा, पढाई नहीं करेगा यानी अज्ञानी बनेगा, जिससे समाज में अज्ञानता फैलेगी,

सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है।

धर्म के प्रकार

धर्म के प्रकार । क्यों? इसलिये क्योंकि धर्म का अर्थ है ‘धारण करना’, धारण करने के लिए हमारे पास दो चीजे है – पहला आत्मा और दूसरा शरीर। हम आत्मा है, परन्तु इस आत्मा को शरीर चाहिए कर्म करने के लिए। तो आत्मा और शरीर ये दो है परन्तु इस का धर्म एक ही है ।

अब प्रश्न यह है की धारण करने वाला कौन है? उत्तर है मन। क्योंकि ब्रह्मबिन्दूपनिषद् २ ने कहा

“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”

अर्थात् मन ही सभी मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का प्रमुख कारण है। इसलिए मन द्वारा ही कर्म होता है। अतएव शरीर व आत्मा को धर्म के द्वारा ही एक निष्ठ होकर ही परम शिव जी को धारण करना चाहिए.

आत्मा का धर्म है – परमात्मा को धारण करना। अर्थात् आत्मा के लिए केवल भगवान धारण करने योग्य है। क्योंकि परमात्मा, आत्मा और माया ये तीन तत्व है। इनमें से आत्मा परमात्मा का अंश है, माया का नहीं। भागवत में कहा गया –

मुनयः साधु पृष्टोऽहं भवद्भिर्लोकमङ्गलम्।
यत्कृतः कृष्णसम्प्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति॥५॥
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥६॥
– भागवत पुराण १.२.५-६
अर्थात् :- (श्री सूतजी ने कहा -) ऋषियों! आपने सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिये यह बहुत सुन्दर प्रश्न किया है, क्योंकि यह प्रश्न श्री कृष्ण के सम्बन्ध में है और इससे भली भाँति आत्मशुद्धि हो जाती है। मनुष्यों के लिये सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिससे गणेश चामुंडा के बाद भगवान श्री कृष्ण की भक्ति शुरू होती है , वो भक्ति भी ऐसी, जिसमें किसी प्रकार की कामना न हो और जो नित्य-निरन्तर बनी रहे। ऐसी भक्ति से हृदय आनन्दस्वरूप परमात्मा शिव जी की उपलब्धि करके ही कृतकृत्य हो जाता है।

श्री कृष्ण ने भी शिव पूजा द्वारा ही शक्ति प्राप्त कि थी.

श्री सूतजी ने कहा ‘अहैतुक्यप्रतिहता’ यानी किसी प्रकार की कामना न हो और नित्य-निरन्तर हो। अतएव भगवान को धारण करना ये आत्मा का धर्म है। और ये आत्मा का जो धर्म है वो नित्य-निरन्तर धर्म है अर्थात् सदा धारण करना है, किसी भी समय आत्मा के धर्म का त्याग नहीं करना है।

अतएव आत्मा का धर्म है – भगवान की उपासना (भक्ति) करना, जिसमें कामना न हो और वो उपासना नित्य-निरन्तर हो। इस आत्मा के धर्म में परिवर्तन नहीं होता क्योंकि आत्मा परिवर्तनशील नहीं है। सभी को भक्ति करनी चाहिए चाहे वो किसी भी अवस्था में हो।

शिललिंग द्वारा ही सभी आत्माओं का जन्म होता है,ओर उसी में लीन हो जाते हैं.

“ यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यों आप अपने उत्पन्न होने की आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट न करें। ”
—ऋग्वेद-3-18-1
सनातन शिव धर्म जिसे हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहा जाता है और यह १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा ने इस धर्म की स्थापना की। क्रमश: कहे तो विष्णु से ब्रह्मा, ब्रह्मा से 11 रुद्र, 11 प्रजापतियों और स्वायंभुव मनु के माध्यम से इस धर्म की स्थापना हुई। इसके बाद इस धा‍र्मिक ज्ञान की शिव के सात शिष्यों से अलग-अलग शाखाओं का निर्माण हुआ। वेद और मनु सभी धर्मों का मूल है। मनु के बाद कई संदेशवाहक आते गए और इस ज्ञान को अपने-अपने तरीके से लोगों तक पहुंचाया।

लगभग 90 हजार से भी अधिक वर्षों की परंपरा से यह ज्ञान श्रीकृष्ण और गौतम बुद्ध तक पहुंचा।

यदि कोई पूछे- कौन है हिन्दू धर्म का संस्थापक तो कहना चाहिए परब्रह्मा शिव है प्रथम और श्रीकृष्ण हैं अंतिम। जो पूछते हैं उन्हें कहो कि…अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ने हिंदू धर्म की स्थापना की। यह किसी पदार्थ नहीं ऋषियों के नाम हैं।
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम्॥- मनु स्मृति
— जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।-मनु स्मृति

— आदि सृष्टि में अवान्तर प्रलय के पश्चात् ब्रह्मा के पुत्र स्वायम्भुव मनु ने धर्म का उपदेश दिया। मनु ने ब्रह्मा से शिक्षा पाकर भृगु, मरीचि आदि ऋषियों को वेद की शिक्षा दी। इस वाचिक परम्परा के वर्णन का पर्याप्‍त भाग मनुस्मृति में यथार्थरूप में मिलता है।

—शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अग्नि, वायु एवं सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद को प्राप्त किया।* प्राचीनकाल में ऋग्वेद ही था फिर ऋग्‍वेद के बाद यजुर्वेद व सामवेद की शुरुआत हुई। बहुत काल तक यह तीन वेद ही थे। इन्हें वेदत्रयी कहा जाने लगा। मान्यता अनुसार इन तीनों के ज्ञान का संकलन भगवान राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था।

— अथर्ववेद के संबंध में मनुस्मृति के अनुसार- इसका ज्ञान सबसे पहले महर्षि अंगिरा को हुआ। बाद में अंगिरा द्वारा सुने गए अथर्ववेद का संकलन ऋषि अथर्वा द्वारा कि‍या गया। इस तरह हिन्दू धर्म ऋग्वेद को भी मानते थे और जो अथर्ववेद को मानते थे। इस तरह चार किताबों का अवतरण हुआ।

— कृष्ण के समय महर्षि पराशर के पुत्र कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) ने वेद को चार प्रभागों में संपादित किया। इन चारों प्रभागों की शिक्षा चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी। उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनि को तथा अथर्ववेद.
हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर कुंडलिनी जागरण कर के ‘ मोक्ष’ की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया था। मोक्ष के बगैर आत्मा की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन शिव धर्म मार्ग माना है। सभी सम्प्रदायों के समान ही शाक्त सम्प्रदाय का उद्देश्य भी मोक्ष है। फिर भी शक्ति का संचय करो, शक्ति की उपासना करो, शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही धर्म है, शक्ति ही सत्य है, शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है और शक्ति की सभी को आवश्यकता है। बलवान बनो, वीर बनो, निर्भय बनो, स्वतंत्र बनो और शक्तिशाली बनो। इसीलिए नाथ और शाक्त सम्प्रदाय के साधक शक्तिमान बनने के लिए तरह-तरह के योग और साधना करते रहते हैं। सिद्धियाँ प्राप्त करते रहते हैं। शक्ति से ही मोक्ष पाया जा सकता है। शक्ति नहीं है तो सिद्ध, बुद्धि और समृद्धि का कोई मतलब नहीं है।

शिव प्रार्थना

दैनिक शिव प्रार्थना
यह सभी वेद शास्त्र पुराणों में स्पष्ट रूप से कहा जाता है कि जीवन का मूल उद्देश्य शिव तक पहुंचना है ताकि मोक्ष को पूजा करके प्राप्त किया जा सके जो आपको शिवशक्ति तक ले जाता है। दैनिक प्रार्थनाओं के माध्यम से सीधे शक्तिमान नवरात्रि

नवरात्रि को अच्छाईयों ओर पुन्यकार्यों एवं आशी्रवादों की बरसात ही कहा गया है। इन दिनों सभी शिवा हिन्दू पूजा व्रत (उपासना) ज्यादा करता है। अपने परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उपासना के साथ, दान धर्म करता है।
यह दिन समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का ही है। इन दिनों में व्रत प्रार्थना कराने वाले के पाप गुनाह जल्द माफ हो जाते हैं।

लोगों की मदद करने का महीना है। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए?
जब शिवा की राह में देने की बात आती है तो हमें कंजूसी नहीं करना चाहिए। शिवा की राह में खर्च करना ही दान है। ग़रीब चाहे वह अन्य धर्म के क्यों न हो, उनकी मदद करने की शिक्षा दी गयी है। दूसरों के काम आना भी एक पूजा ही समझी जाती है।
ग़रीबों की मदद, दोस्त में जो ज़रुरतमंद हैं उनकी मदद करना ज़रूरी समझा और माना जाता है।

कन्या पूजा करना पाप नष्ट करने का बहुत अच्छा कार्य है.
अपनी ज़रूरीयात को कम करना और दूसरों की ज़रूरीयात को पूरा करना अपने पापों को कम और अच्छाई को ज़्यादा कर देता है।

नवरात्रि के व्रत रखने से, उसके सब पिछले पापों माफ कर दिए जाएँगे। व्रत हमे अपने आप पर अपनी इन्द्रियो को काबू करने की ऐसी शक्ति देते है कि जिस से हम नये उत्साह से परेशानीयों का बहुत मजबूत हो कर सामना कर सकते है । हमारे अन्दर नयी ऊर्जा का संचार पैदा करते है। जो अन्दर के लोभ लालच पाप से दुर हटने की शक्ति उत्पन्न होती है, ओर हम शिवा के ओर निकट आ जाते है.
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नवरात्रि

नवरात्रि को अच्छाईयों ओर पुन्यकार्यों एवं आशी्रवादों की बरसात ही कहा गया है। इन दिनों सभी शिवा हिन्दू पूजा व्रत (उपासना) ज्यादा करता है। अपने परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उपासना के साथ, दान धर्म करता है।
यह दिन समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का ही है। इन दिनों में व्रत प्रार्थना कराने वाले के पाप गुनाह जल्द माफ हो जाते हैं।

लोगों की मदद करने का महीना है। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए?
जब शिवा की राह में देने की बात आती है तो हमें कंजूसी नहीं करना चाहिए। शिवा की राह में खर्च करना ही दान है। ग़रीब चाहे वह अन्य धर्म के क्यों न हो, उनकी मदद करने की शिक्षा दी गयी है। दूसरों के काम आना भी एक पूजा ही समझी जाती है।
ग़रीबों की मदद, दोस्त में जो ज़रुरतमंद हैं उनकी मदद करना ज़रूरी समझा और माना जाता है।

कन्या पूजा करना पाप नष्ट करने का बहुत अच्छा कार्य है.
अपनी ज़रूरीयात को कम करना और दूसरों की ज़रूरीयात को पूरा करना अपने पापों को कम और अच्छाई को ज़्यादा कर देता है।

नवरात्रि के व्रत रखने से, उसके सब पिछले पापों माफ कर दिए जाएँगे। व्रत हमे अपने आप पर अपनी इन्द्रियो को काबू करने की ऐसी शक्ति देते है कि जिस से हम नये उत्साह से परेशानीयों का बहुत मजबूत हो कर सामना कर सकते है । हमारे अन्दर नयी ऊर्जा का संचार पैदा करते है। जो अन्दर के लोभ लालच पाप से दुर हटने की शक्ति उत्पन्न होती है, ओर हम शिवा के ओर निकट आ जाते है.
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shiva dharmaशिव जी के साथ संवाद कर सकता है। इसके अतिरिक्त, यह प्रार्थना पुजा व्यक्ति को बुरी आदतों और बुरे कर्मों से रोकती है। पवित्र शिव पुराण, उल्लेख करता है कि स्वर्ग की कुंजी दैनिक प्रार्थना दैनिक पूजा ही है।
शिव पूजा, एक शब्द, इस ग्रह पर प्रत्येक शिव हिंदू को दिव्य धागे सुत्र से बांधता है जो उन्हें सर्वोच्च शिव से जोड़ता है। यह शिव शक्ति को बेहतर तरीके से जोड़ने और जानने के लिए अपने भक्त को एक बुद्धिमान मार्ग प्रदान करता है। सभी हिंदू एक दिन में कम से कम दो बार प्रार्थना करते हैं क्योंकि यह अनिवार्य है। यदि आप प्रार्थना नहीं करते हैं, तो शिव शक्ति आपको न्याय के देव यमराज द्वारा जरूर दंडित करेगी।
सभी भक्तों के लिए विशेष अवसरों पर अन्य भक्तों के साथ शिव मंदिर में प्रार्थना की जानी चाहिए । उत्तर की दिशा में शिव कैलाश की तरफ मुख कर प्रार्थनाओं को कहा जाना चाहिए।
सुबह प्रार्थना करने के लिए एक बुलावा
शिव हिंदू समुदायों में, लोगों को प्रार्थना के लिए दैनिक बुलावा 🔔 द्वारा पूजा की याद दिलाई जाती है, मंदिर के नजदीक से हो सकती है।
प्रार्थना क्यो अनिवार्य है ?
कई पवित्र पुस्तकों में प्रार्थना का महत्व अच्छी तरह से प्रलेखित किया गया है।
कि हर हिंदू स्त्री पुरूष को दिन में 2 बार प्रार्थना की पेशकश की जाती है क्योंकि प्रार्थना से कोई छूट नहीं होती है। जो भी इस महत्वपूर्ण धार्मिक दायित्व को नहीं करता है वह शिव कानून तोड़ रहा है और उसे न्याय के दिन पर दंडित जरूर किया जाएगा।
पूजा से पहले सफाई
प्रार्थना करने से पहले, प्रार्थना करने से पहले हाथ, पैर, बाहों और पैरों को धोना अनिवार्य है। यह सफाई नकारात्मक प्रभाव को हटाती है और तंत्रिका तंत्र को आराम करने में मदद करती है और तनाव, तनाव और चिंता को आसान बनाती है।
2 प्रार्थना का लाभ
(सुबह की प्रार्थना)
इस प्रार्थना का समय सुबह की शुरुआत से शुरू होता है और सूर्य उदय तक रहता है।
प्रार्थना के लिए सुबह जल्दी उठना चुनौतीपूर्ण है। हालांकि, दिन की शुरुआत में प्रार्थना करते हुए, अपने दिन को हल्का करो। यह आपको सकारात्मक ऊर्जा और मार्गदर्शन देता है। शिव जी कहते हैं, कि जो भी प्रार्थना करता है वह निश्चित रूप से पूरे दिन शिव जी उसकी रक्षा करते है । वह पूरे दिन शिव सर्वशक्तिमान के संरक्षण और आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए सुबह की प्रार्थना जरूर करने का प्रयास करें। सुबह की शुरुआत में, सभी भगवान देवी की सुपर ऊर्जा शिव सर्वशक्तिमान द्वारा शिव भक्त को देखने के लिए भेजी जाती है जो सुबह की प्रार्थना कर रहे हैं। इसलिए, सुबह प्रार्थना की पेशकश करना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नरक से बचाता है।
यह प्रार्थना स्वर्ग के लिए भी दरवाजा खोलती है। इसलिए, इस समय अच्छे कर्म करना महत्वपूर्ण है।
यदि आप प्रार्थना करते हैं और न्याय के दिन नरक की आग से आपको बचाएंगे तो शिव सर्वशक्तिमान है सबसे ज्यादा महत्वपूर्णता उन का आशीर्वाद है।
आपके जीवन में किए गए किसी भी अन्य अच्छे कर्मों के लिए शायद आपको कोई इनाम मिलेगा या न मिले , परन्तु प्रार्थना पुजा का फल जरूर प्राप्त होता ही हैं।
आपको जीवन में सफलता के साथ-साथ इसके बाद भी, आपके स्वास्थ्य और परिवार के लिए प्रार्थना महत्वपूर्ण होगी। अपनी संपत्ति को बढ़ाने के लिए नियमित रूप से प्रार्थना करना महत्वपूर्ण है।

2- (शाम की प्रार्थना) शाम की
प्रार्थना का प्रभाव आधी रात तक बना रहता है। यदि आप यह प्रार्थना करते हैं, तो शिव आपको इनाम देंगे। तो, सुनिश्चित करें कि आप शाम की प्रार्थनाओं को भी याद करना हैं। शिव शक्ति आपके प्रार्थना को जरूर सुनेंगे और आप पर आशीर्वाद की बारिश कर देंगे।
चूंकि यह दिन की आखिरी प्रार्थना है, यदि आप सोने से पहले अपनी प्रार्थना करते हैं, तो आपके पास अधिक शांतिपूर्ण रात है। शांतिपूर्ण नींद के लिए, नींद से पहले अपनी प्रार्थनाओं को पेश करना महत्वपूर्ण है।
हालांकि, इन 2 अनिवार्य प्रार्थनाओं के साथ अन्य हिंदू प्रार्थना भी हैं। वो हैं:
प्रार्थना की आध्यात्मिक, धार्मिक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, सामाजिक, आदि जैसे कई फायदे हैं। आपके दिमाग और आत्मा को आराम देगी। योगिक दर्शन के अनुसार सभी सात चक्रों को सक्रिय करना बेहद फायदेमंद है। यह शरीर की मांसपेशियों और रक्त परिसंचरण के लिए बेहद फायदेमंद है।
एक दिन में 2 बार प्रार्थना करना धर्म के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक है। हालांकि, कभी-कभी परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं जहां प्रार्थना समय पर नही किया जा सकता है। परंपरा निर्देश देती है कि हिंदू को किसी भी याद करने के बाद जितनी जल्दी हो सके अपनी छुटी प्रार्थना पुरी कर लेनी चाहिए।
मैंने पूजा और इसके अर्थ के बारे में सारी जानकारी का सहयोग करने का प्रयास किया। यदि आप सुधार का सुझाव देना चाहते हैं तो कृपया नीचे दी गई टिप्पणियों में मुझे बताएं।
पूजा का मुख्य उद्देश्य शिव भगवान के साथ एकरूप होकर सभी को अपने साथ जोड कर सभी के अन्दर शिव रूपी प्रकाश ऊर्जा का संचार और एक रूप एक जुट होकर कार्य करना है। “शुरूआत ” का जिक्र करते हुए, शिव पुराण का पहला मंत्र,
ओम नमः शिवाय
जैसा कि दैनिक पूजा में आवश्यक है, भक्त भगवान के सामने खड़े हो सकते हैं, धन्यवाद और उसकी प्रशंसा कर सकते हैं और “सीधे पथ” के साथ मार्गदर्शन मांग सकते हैं।
इसके अलावा, दैनिक पूजा हिंदू को भगवान के आशीर्वाद के लिए धन्यवाद देने के लिए याद करे और भगवान को प्रस्तुत करने से अन्य सभी चिंताओं पर प्राथमिकता होती है, जिससे शिव जी के चारों ओर ऊर्जा धुम रही है , जैसे शिव जी के चारो तरफ देव गण घूमते है , अपने जीवन को शिव जी की इच्छा के सामने रक्खे हैं। पूजा भी भगवान को याद करने की औपचारिक विधि के रूप में कार्य करती है।
सभी हिंदू का मानना है कि भगवान के सभी भगवान देवी ने केवल शिव को दैनिक प्रार्थना कर के ही शक्तिशाली हुए है, और भगवान शिव के साथ एकता को प्रस्तुत करने में विनम्र थे। शिव हिंदू भी मानते हैं कि सभी गुरु और ब्राह्मणों का मुख्य कर्तव्य मानव जाति को नम्रतापूर्वक भगवान शिव की एकता के लिए प्रस्तुत करना ही सिखाता है।
सभी पवित्र पुस्तकों में, यह लिखा गया है कि: “क्योंकि, विश्वास करने वाले लोग हैं, जब भगवान का उल्लेख किया जाता है, उनके दिल में प्रेम से भर उठते हैं, और जब वे शिव जी के संकेतों को सुनते हैं, तो उनके विश्वास को मजबूत करते हैं, और अपने विश्वास को मजबूत करते हैं .
“जिनके दिल, जब भगवान का उल्लेख किया गया है, वे भय से भरे हुए हैं, जो अपने दुःखों पर धीरज रखते हैं, नियमित प्रार्थना करते रहते हैं, और जो हमने उन्हें दिया है उससे बाहर शिव जी के कार्य पर (दान में) भी खर्च करते हैं।”
HAR HAR MAHADEV

शिव

– शिव के बिना शव बन जाए गा ,
बिना शिव शक्ति, बकरीयों का झुंड बन जाए गा, जो चाहे गा हांक ले जाए गा। जिन का धर्म शिव शक्ति नहीं है ,उस का कुछ नहीं हो सकता है। शिव ही सम्पूर्ण विश्व के देवों के देव महादेव हैं। असली धर्म वह जो शिव द्वारा उत्पन्न संगठन संचालित होता है। शक्ति लिगं द्वारा ही संसार विश्व की रचना और सभी आत्माओ का जन्म हुआ है, संस्कृति धर्म शिव शक्ति से प्रकट होता है ओर में में लोप हो जाते हैं। पहला सच्चा बीज है धर्म जो शिव द्वारा आधार चक्र आत्मा में उत्पन्न होता है।

शिवा प्रकाश

शिव अमृत की रोशनी जो मुश्किल से मुश्किल वक्त में इंसान के दिल को आराम और शांति प्रदान करता है

प्रार्थना को इस लिए बिल्कुल ठीक कहा गया है कि ताकि इंसान साफ सुथरा हो कर पूजा प्राथना के द्वारा शिवा के क़रीब हो जा जाऐ।

प्रार्थना इन्सान के पापों को नष्ट कर देती है

प्रार्थना द्वारा कारोबार मे बढ़ोतरी

प्रार्थना द्वारा शिवा को याद करें और उन का धन्यवाद करे , और इस प्रार्थना के द्वारा शिवा को याद करें ताकि ,कोई भुल ना हो सकें और इस शिवा के बारे कोई कुतर्क कर पाप के भागीदार न बने .

शिवा प्रार्थना के लिये खुशी के साथ खड़ा होना है। पाप मुक्त होना ही है.

प्रार्थना ही है कि इंसान हमेशा शिवा की याद में रहे और उसे किसी भी हाल मे कभी न भूले , मना ना करे।

इस के इलावा इंसान प्रार्थना के द्वारा हमेशा और हरवक्त़ शिवा के सामने में उपस्थिति रहे और उसकी याद से ही आन्नद मे रह सकता है । प्रतेक दिन की प्रार्थना ही हमे अपराधों से रोकती है और बुराईयों को दूर करती है ,

अंहकार ,पाप और को दूर करती है और शिवा की याद में रहने ही से, पापों से दूर हटना ही होता है.

शिवा का कर्ज

दूसरों का प्यार और अच्छाई का एहसान का धन्यवाद करना ही चाहिए .

अच्छाई जितनी ज़्यादा हो और अच्छाई करने वाले का धन्यवाद भी इतना ही ज़्यादा और अच्छा होना चाहिए। क्या शिवा से ज़्यादा कोई और हमारे ऊपर अधिकार रखता है ? नहीं न। इस लिए कि उन के अाश्रिवाद हमारे ऊपर बहुत ही ज्यादा हैं और एक मात्र शिवा ही है जिन्होंने ने खुद जहर पी कर अपने आप को मिटा ही दिया था.

एक शिवा जी ने किया और वो सब चीजों भी हमे दी जो ज़िंदगी जीने के लिये जरुरी है जैसे, सुर्य की रोशनी जो शिव द्वारा ही प्रकट है , आकाश, पृथ्वी, हवा, पानी, मकान, पुरी सृष्टि, शरीर, प्यार, वृक्ष,

देवी देवताओं को भेजा, अच्छे बुरे मे फर्क करना सिखाया

बडी मंज़िल को प्राप्त करने के लिये साहस उत्पन्न किया । शिवा शक्ति से ज़्यादा किस ने हमारे साथ अच्छाई और एहसान किया है कि इस से ज़्यादा कोई कर ही नही सकता है।

हमारे लिये तो धन्यवाद करना भी छोटा लफ्ज है

यह हम उस शिवा की इन सब अच्छाई का धन्यवाद करें और उन अच्छाईयों के लिये धन्यवाद में उसकी प्रार्थना पुजा करें।

चूँकि वो हमारा मालिक है, इसलिए हम भी सिर्फ उसी की प्रार्थना करें और सिर्फ इसी के बने रहें और झूठ के ग़ुलाम ना बनें। प्रार्थना शिवा के लिए धन्यवाद है और विश्वास को मजबूत करता है। जिस से आत्मा का विकास होता है, जिन की आत्मा विकसित होती है उन का देश समाज भी विकसित होता ही है.

नवरात्रि

नवरात्रि को अच्छाईयों ओर पुन्यकार्यों एवं आशी्रवादों की बरसात ही कहा गया है। इन दिनों सभी शिवा हिन्दू पूजा व्रत (उपासना) ज्यादा करता है। अपने परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उपासना के साथ, दान धर्म करता है।
यह दिन समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का ही है। इन दिनों में व्रत प्रार्थना कराने वाले के पाप गुनाह जल्द माफ हो जाते हैं।

लोगों की मदद करने का महीना है। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए?
जब शिवा की राह में देने की बात आती है तो हमें कंजूसी नहीं करना चाहिए। शिवा की राह में खर्च करना ही दान है। ग़रीब चाहे वह अन्य धर्म के क्यों न हो, उनकी मदद करने की शिक्षा दी गयी है। दूसरों के काम आना भी एक पूजा ही समझी जाती है।
ग़रीबों की मदद, दोस्त में जो ज़रुरतमंद हैं उनकी मदद करना ज़रूरी समझा और माना जाता है।

कन्या पूजा करना पाप नष्ट करने का बहुत अच्छा कार्य है.
अपनी ज़रूरीयात को कम करना और दूसरों की ज़रूरीयात को पूरा करना अपने पापों को कम और अच्छाई को ज़्यादा कर देता है।

नवरात्रि के व्रत रखने से, उसके सब पिछले पापों माफ कर दिए जाएँगे। व्रत हमे अपने आप पर अपनी इन्द्रियो को काबू करने की ऐसी शक्ति देते है कि जिस से हम नये उत्साह से परेशानीयों का बहुत मजबूत हो कर सामना कर सकते है । हमारे अन्दर नयी ऊर्जा का संचार पैदा करते है। जो अन्दर के लोभ लालच पाप से दुर हटने की शक्ति उत्पन्न होती है, ओर हम शिवा के ओर निकट आ जाते है.
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