हिन्दू सनातन शिव धर्म

सनातन शिव हिंदू धर्म के संस्थापक सब से बडे भगवान देवों के देव महादेव हैं.

सनातन धर्म अपने मूल रूप हिंदु धर्म के वैकल्पिक नाम से जाना जाता है।

वैदिक काल में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के लिये ‘सनातन धर्म’ नाम मिलता है।

‘सनातन’ का अर्थ है – शाश्वत या ‘हमेशा बना रहने वाला’, अर्थात् जिसका न आदि है न अन्त, वह सिर्फ मूल तत्व सदा शिव परमशिव ही हैं जिन्हें पाराब्रम्हा भी कहा जाता है ।

धर्म शब्द का अर्थ

धारयति इति धर्मः – धर्म का अर्थ होता है “धारण करना”।
प्रश्न – क्या धारण करना चाहिए?

उत्तर – जो धारण करने योग्य हो.

अब प्रश्न उठता है कि धारण करने योग्य क्या है जिसे धारण करना ही चाहिए जिसे धारण करने से सभी दुखों से छुटकारा मिल सके जो देवों का देव महादेव ही है, जिस का जन्म है न मृत्यु वही तत्व ही सत्य जो सत्य हो उसी को धारण करना चाहिए जो मोक्ष दाता है ।
प्रश्न – कैसे धारण करें ?

उत्तर – जो धर्मग्रंथों ने कहा कि प्रतिदिन शिव पूजन करना जिससे दिन प्रति दिन ऊर्जा का संचार शरीर में होता रहे सत्य की पहचान सत्यम शिवम सुन्दरम, क्षमा, विद्या, दया, दान शिव धर्म, तप आदि।

धर्म क्या है?

जो धारण करने योग्य है उसे धर्म कहते है। इसलिये जो उपर्युक्त महाभारत में कहा कि कर्म में लगे रहना, उदारता, दण्ड, सत्य, दान धर्म है।

इसका अर्थ यह है की ये धारण करने योग्य है। इसलिये इस धर्म को निभाना चाहिए अर्थात् इनको धारण करना चाहियें। दुसरे शब्दों में जो सनातन धर्म के ग्रंथों में धर्म के बारे में कहा गया है कि ये धर्म है, ये अधर्म है और मनुष्य को धर्म का पालन करना चाहिए। इसका भाव यह है कि ये धारण करने योग्य है और मनुष्य को धारण करना चाहिए एवं पालन करना चाहिए। उदाहरण के लिए –

शिव जी का ध्यान हमेशा मन में पक्ष कर ही कर्म में लगे रहना धर्म है। अर्थात् कर्म में लगे रहना धारण करने योग्य है।
उदारता धर्म है। अर्थात् उदारता धारण करने योग्य है।
सत्य धर्म है। अर्थात् सत्य धारण करने योग्य है।
दया धर्म है। अर्थात् दया धारण करने योग्य है।

एक प्रश्न मन में उठ सकता है कि ये धारण करने योग्य क्यों है? क्यों हम सत्य, क्षमा, विद्या, दया आदि को धारण करे? क्यों हम असत्य, क्रोध, अविद्या, क्रूरता आदि को नहीं धारण करे?

ये ग्रंथ कौन होते है हमें सिखाने वाला। तो इसका उत्तर बड़ा सरल है – आप असत्य, क्रोध, अविद्या, क्रूरता को धर्म मान ले यानी धारण करले। ऐसा करते ही, स्वयं का और पुरे समाज का बुरा दिन शुरु हो जायेगा। क्योंकि फिर कोई व्यक्ति किसी की मदद नहीं करेगा, हमेंशा झूट बोलेगा, पढाई नहीं करेगा यानी अज्ञानी बनेगा, जिससे समाज में अज्ञानता फैलेगी,

सनातन धर्म मूलत: भारतीय धर्म है, जो किसी ज़माने में पूरे वृहत्तर भारत (भारतीय उपमहाद्वीप) तक व्याप्त रहा है। विभिन्न कारणों से हुए भारी धर्मान्तरण के बाद भी विश्व के इस क्षेत्र की बहुसंख्यक आबादी इसी धर्म में आस्था रखती है।

धर्म के प्रकार

धर्म के प्रकार । क्यों? इसलिये क्योंकि धर्म का अर्थ है ‘धारण करना’, धारण करने के लिए हमारे पास दो चीजे है – पहला आत्मा और दूसरा शरीर। हम आत्मा है, परन्तु इस आत्मा को शरीर चाहिए कर्म करने के लिए। तो आत्मा और शरीर ये दो है परन्तु इस का धर्म एक ही है ।

अब प्रश्न यह है की धारण करने वाला कौन है? उत्तर है मन। क्योंकि ब्रह्मबिन्दूपनिषद् २ ने कहा

“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”

अर्थात् मन ही सभी मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का प्रमुख कारण है। इसलिए मन द्वारा ही कर्म होता है। अतएव शरीर व आत्मा को धर्म के द्वारा ही एक निष्ठ होकर ही परम शिव जी को धारण करना चाहिए.

आत्मा का धर्म है – परमात्मा को धारण करना। अर्थात् आत्मा के लिए केवल भगवान धारण करने योग्य है। क्योंकि परमात्मा, आत्मा और माया ये तीन तत्व है। इनमें से आत्मा परमात्मा का अंश है, माया का नहीं। भागवत में कहा गया –

मुनयः साधु पृष्टोऽहं भवद्भिर्लोकमङ्गलम्।
यत्कृतः कृष्णसम्प्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति॥५॥
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥६॥
– भागवत पुराण १.२.५-६
अर्थात् :- (श्री सूतजी ने कहा -) ऋषियों! आपने सम्पूर्ण विश्व के कल्याण के लिये यह बहुत सुन्दर प्रश्न किया है, क्योंकि यह प्रश्न श्री कृष्ण के सम्बन्ध में है और इससे भली भाँति आत्मशुद्धि हो जाती है। मनुष्यों के लिये सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिससे गणेश चामुंडा के बाद भगवान श्री कृष्ण की भक्ति शुरू होती है , वो भक्ति भी ऐसी, जिसमें किसी प्रकार की कामना न हो और जो नित्य-निरन्तर बनी रहे। ऐसी भक्ति से हृदय आनन्दस्वरूप परमात्मा शिव जी की उपलब्धि करके ही कृतकृत्य हो जाता है।

श्री कृष्ण ने भी शिव पूजा द्वारा ही शक्ति प्राप्त कि थी.

श्री सूतजी ने कहा ‘अहैतुक्यप्रतिहता’ यानी किसी प्रकार की कामना न हो और नित्य-निरन्तर हो। अतएव भगवान को धारण करना ये आत्मा का धर्म है। और ये आत्मा का जो धर्म है वो नित्य-निरन्तर धर्म है अर्थात् सदा धारण करना है, किसी भी समय आत्मा के धर्म का त्याग नहीं करना है।

अतएव आत्मा का धर्म है – भगवान की उपासना (भक्ति) करना, जिसमें कामना न हो और वो उपासना नित्य-निरन्तर हो। इस आत्मा के धर्म में परिवर्तन नहीं होता क्योंकि आत्मा परिवर्तनशील नहीं है। सभी को भक्ति करनी चाहिए चाहे वो किसी भी अवस्था में हो।

शिललिंग द्वारा ही सभी आत्माओं का जन्म होता है,ओर उसी में लीन हो जाते हैं.

“ यह पथ सनातन है। समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से पैदा हुए हैं तथा प्रगति की है। हे मनुष्यों आप अपने उत्पन्न होने की आधाररूपा अपनी माता को विनष्ट न करें। ”
—ऋग्वेद-3-18-1
सनातन शिव धर्म जिसे हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहा जाता है और यह १९६०८५३११० साल का इतिहास हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित अग्नि, आदित्य, वायु और अंगिरा ने इस धर्म की स्थापना की। क्रमश: कहे तो विष्णु से ब्रह्मा, ब्रह्मा से 11 रुद्र, 11 प्रजापतियों और स्वायंभुव मनु के माध्यम से इस धर्म की स्थापना हुई। इसके बाद इस धा‍र्मिक ज्ञान की शिव के सात शिष्यों से अलग-अलग शाखाओं का निर्माण हुआ। वेद और मनु सभी धर्मों का मूल है। मनु के बाद कई संदेशवाहक आते गए और इस ज्ञान को अपने-अपने तरीके से लोगों तक पहुंचाया।

लगभग 90 हजार से भी अधिक वर्षों की परंपरा से यह ज्ञान श्रीकृष्ण और गौतम बुद्ध तक पहुंचा।

यदि कोई पूछे- कौन है हिन्दू धर्म का संस्थापक तो कहना चाहिए परब्रह्मा शिव है प्रथम और श्रीकृष्ण हैं अंतिम। जो पूछते हैं उन्हें कहो कि…अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा ने हिंदू धर्म की स्थापना की। यह किसी पदार्थ नहीं ऋषियों के नाम हैं।
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु : समलक्षणम्॥- मनु स्मृति
— जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा से ऋग, यजुः, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।-मनु स्मृति

— आदि सृष्टि में अवान्तर प्रलय के पश्चात् ब्रह्मा के पुत्र स्वायम्भुव मनु ने धर्म का उपदेश दिया। मनु ने ब्रह्मा से शिक्षा पाकर भृगु, मरीचि आदि ऋषियों को वेद की शिक्षा दी। इस वाचिक परम्परा के वर्णन का पर्याप्‍त भाग मनुस्मृति में यथार्थरूप में मिलता है।

—शतपथ ब्राह्मण के अनुसार अग्नि, वायु एवं सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद को प्राप्त किया।* प्राचीनकाल में ऋग्वेद ही था फिर ऋग्‍वेद के बाद यजुर्वेद व सामवेद की शुरुआत हुई। बहुत काल तक यह तीन वेद ही थे। इन्हें वेदत्रयी कहा जाने लगा। मान्यता अनुसार इन तीनों के ज्ञान का संकलन भगवान राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था।

— अथर्ववेद के संबंध में मनुस्मृति के अनुसार- इसका ज्ञान सबसे पहले महर्षि अंगिरा को हुआ। बाद में अंगिरा द्वारा सुने गए अथर्ववेद का संकलन ऋषि अथर्वा द्वारा कि‍या गया। इस तरह हिन्दू धर्म ऋग्वेद को भी मानते थे और जो अथर्ववेद को मानते थे। इस तरह चार किताबों का अवतरण हुआ।

— कृष्ण के समय महर्षि पराशर के पुत्र कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) ने वेद को चार प्रभागों में संपादित किया। इन चारों प्रभागों की शिक्षा चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी। उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनि को तथा अथर्ववेद.
हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और मोक्ष की गहरी अवस्था में ब्रह्म, ब्रह्मांड और आत्मा के रहस्य को जानकर उसे स्पष्ट तौर पर व्यक्त किया था। वेदों में ही सर्वप्रथम ब्रह्म और ब्रह्मांड के रहस्य पर से पर्दा हटाकर कुंडलिनी जागरण कर के ‘ मोक्ष’ की धारणा को प्रतिपादित कर उसके महत्व को समझाया गया था। मोक्ष के बगैर आत्मा की कोई गति नहीं इसीलिए ऋषियों ने मोक्ष के मार्ग को ही सनातन शिव धर्म मार्ग माना है। सभी सम्प्रदायों के समान ही शाक्त सम्प्रदाय का उद्देश्य भी मोक्ष है। फिर भी शक्ति का संचय करो, शक्ति की उपासना करो, शक्ति ही जीवन है, शक्ति ही धर्म है, शक्ति ही सत्य है, शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है और शक्ति की सभी को आवश्यकता है। बलवान बनो, वीर बनो, निर्भय बनो, स्वतंत्र बनो और शक्तिशाली बनो। इसीलिए नाथ और शाक्त सम्प्रदाय के साधक शक्तिमान बनने के लिए तरह-तरह के योग और साधना करते रहते हैं। सिद्धियाँ प्राप्त करते रहते हैं। शक्ति से ही मोक्ष पाया जा सकता है। शक्ति नहीं है तो सिद्ध, बुद्धि और समृद्धि का कोई मतलब नहीं है।

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